Sunday, 25th February, 2018

चलते चलते

बंदरों ने भी किया इंसानों से संबंध होने से इनकार, साइंटिस्ट 'सच्चेपाल' ने किया डार्विन को ग़लत साबित

22, Jan 2018 By Saquib Salim

एजेंसी. विज्ञान जगत में आज उस समय एक भूचाल सा आ गया, जब महान भारतीय वैज्ञानिक ‘सच्चेपाल सिंह’ ने एक सम्मेलन को संबोधित करते हुए अपने नये शोध के बारे में बताया। उन्होंने बताया कि मशहूर शोध संस्था ‘कुछ भी बक दो पार्टी’ के वैज्ञानिकों ने यह पता लगाया है कि वर्षों से स्कूल और कॉलेजों में पढ़ाया जाने वाला डार्विन का सिद्धांत सरासर ग़लत है।

Charles Darwin-Satyapal
डार्विन से आगे निकले भारतीय वैज्ञानिक सच्चेपाल

ग़ौरतलब है कि उन्नीसवीं सदी में डार्विन ने यूरोप में ये सिद्धांत दिया था कि मनुष्य दरअसल बंदरों के वंशज हैं। तब से ही पढ़े-लिखे अंग्रेज़ों को ये बात बहुत जंची और उन्होंने इसको मान लिया। हालांकि बंदरों ने और धार्मिक लोगों- जैसे कि मुल्ला-मौलवी, पादरी, पण्डित इत्यादि ने इस सिद्धांत को पागलपन क़रार दिया। इन सब का शुरु से ही कहना था कि इंसान और बन्दर का कोई रिश्ता हो ही नहीं सकता।

भला आपने कभी किसी बन्दर को बन्दरी का बलात्कार करते सुना है, या कभी ये सुना है कि बंदरों के एक झुण्ड ने दूसरे बंदरों पर इसलिए हमला कर दिया कि उनका धर्म दूसरा था। न ही कभी एक देश के बंदरों का दूसरे देश के बंदरों से कोई युद्ध ही होता है। ये सब तो छोड़िये! बंदर आपस में धर्म या जाति के आधार पर भेदभाव भी नहीं करते और न ही वे आधार कार्ड बनवाते हैं।

ऐसे में बंदरों का एतराज़ इस बात पर था कि इंसान उस से रिश्तेदारी क्यों निकालता है! आज भारतीय वैज्ञानिकों ने बरसों से बंदर समाज पर लगी ये तोहमत मिटा डाली। ‘सच्चेपाल सिंह’ जी का तो मानना है कि ‘शून्य’ के बाद ये भारत की विज्ञान के क्षेत्र में सब से बड़ी उपलब्धि है। और इस से बंदरों को समाज में फिर से खोई हुई इज़्ज़त प्राप्त हो सकेगी।

बंदर समाज का कहना है कि वे डार्विन की इस बेवकूफ़ी से काफ़ी परेशान थे। जब से इंसान से उनकी रिश्तेदारी की बात आम हुई थी, तभी से बाक़ी जानवर उन्हें नीची निगाह से देखते थे। उन्होंने ‘कुछ भी बक दो पार्टी’ के वैज्ञानिकों का आभार व्यक्त किया।

शोध के बारे में विस्तार से बताते हुए श्री सिंह ने कहा कि उन्होंने लम्बे समय तक मनुष्य और अन्य जानवरों पर नज़र रखी और उनके व्यहवार को परखा। उन्होंने पाया कि इस दौरान एक भी बंदर न तो इंसान बना और ना ही उन्होंने इसमें कोई दिलचस्पी दिखायी। यहाँ तक कि बंदरों को जब रिश्वत दी गयी तो उन्होंने तब भी इंसान बनने से इंकार कर दिया। दूसरी ओर, इस दौरान उन्होंने पाया कि इंसान तेज़ी से बंदर बन रहे हैं और जो नहीं बने हैं वे बनना चाहते हैं।

शोध के दौरान उन्होंने ढेर सारे डिस्को और डीजे में इंसानों को बंदर सा व्यवहार करते हुए पाया। वहां इंसान बंदर की तरह उछल-कूद कर रहे थे, जिनमें से कुछ सड़क पर भी ऐसे ही उछलते हुए पाए गए। इसके अलावा, उन्होंने ये भी पाया कि इंसान बंदर के नक़ल करने वाले गुण को भी पूरी तरह अपना चुका है. स्कूल के समय से ही वे एक दूसरे की कॉपी से नक़ल करने लगते हैं, फिर एक दूसरे के कपडे का ब्रांड नक़ल करते हैं, फिर गाड़ी का, फिर खाने का, हर चीज़ की नक़ल कर के इंसान बंदरों को कब का पीछे छोड़ चुका है।

श्री सिंह ने ये भी बताया कि केवल बंदर ही नहीं और भी कई जानवर हैं, जिनमें कि इंसान दिलचस्पी ले रहा है और उनके जैसा बन रहा है। पूछने पर उन्होंने बताया कि इस लिस्ट में गधे का नाम सब से ऊपर है। भारत में ही कई प्राणी गधा बनने की फ़िराक में हैं। उन्होंने बताया कि इस ओर रिसर्च जारी है और इस बार एक्सपेरिमेंट वो ख़ुद पर और अपनी ही संस्था के अन्य वैज्ञानिकों पर कर रहे हैं। उन्होंने आशा जताई कि जल्द ही वे गधों को पीछे छोड़ देंगे और इस तरह डार्विन के सिद्धांत को पूरी तरह ग़लत साबित कर देंगे।



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