Thursday, 19th October, 2017

चलते चलते

सिर्फ़ दस हज़ार देकर युवक ने छुड़ाया रैंसमवेयर से पिंड, एंटीवायरस खरीदकर दोस्त हुआ कंगाल

16, May 2017 By Ritesh Sinha

गुरुग्राम. दाल की कीमत 150 रुपये किलो भी हो जाये तो सभी राजनैतिक दल आसमान सिर पे उठा लेते है, लेकिन इन नेताओं को एंटीवायरस की बढ़ती हुई कीमतें कभी नज़र ही नहीं आती। एक अच्छा एंटी-वायरस खरीदना आजकल आम आदमी के बस की बात नहीं रह गई है। ऊपर से आए दिन अपडेट-शपडेट का झंझट! जैसा कि टेक-सिटी में रहने वाले एक युवक साकेत सिंह के साथ हुआ। उसके कुछ पर्सनल डाटा “रैंसमवेयर” की चपेट में आ गए। अटैक करने वालों ने साकेत से दस हज़ार रुपये की फ़िरौती मांगी। उसने तुरंत ये पैसे चुकाये और अपना डाटा वापस हासिल कर लिया।

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अपने महंगे एंटी-वायरस को देखता नमन

लेकिन साकेत के दोस्त नमन ने हैकर्स को पैसा देने से इंकार कर दिया और बोला- “दस हज़ार रुपये उस मूर्ख को देने से अच्छा है, मैं इसी पैसे से एक अच्छा एंटीवायरस खरीद लेता हूँ।” और एक एंटीवायरस डाउनलोड करना शुरू कर दिया। सबसे पहले तो उस एंटी-वायरस को एक्टिवेट करने के लिए नमन को 10,000 रु. देने पड़े। एंटीवायरस एक्टिवेट होते ही उसने अपने दोस्त साकेत से कहा “देख इधर! मैंने अपने लैपटॉप में एंटीवायरस इनस्टॉल कर लिया है, अब तीन साल तक मेरे सिस्टम को कुछ नहीं होगा। ये छोटे-मोटे रैंसमवेयर मेरे ‘डाटा’ का कुछ नहीं बिगाड़ सकते। लेकिन तुझे तो पैसे देने की इतनी जल्दी थी ना! मुझसे पूछ तो लिया होता!” -नमन ने सीना तानकर कहा।

तभी नमन को एंटीवायरस कंपनी से एक नया मेल आया, जिसमे अंग्रेजी में लिखा था “सिर्फ 3000/- दीजिए और अपने पैक को अपग्रेड कर लीजिए!” यह मेल देखकर नमन का मुंह खुला का खुला रह गया। उसने कहा “अभी तो दस हज़ार देकर नया एंटीवायरस खरीदा है, तो फिर से ये अपग्रेड करने के लिए क्यों कह रहा है?’

तब साकेत ने उसे समझाया कि “यार तूने जो पैक लिया है उस पैक में सिर्फ Malware, Spyware, Virus, Worm से सुरक्षा मिलेगी, ट्रोजन से नहीं! इसलिए अब तुझे 3000/- अलग से देने पड़ेंगे, ट्रोजन से छुटकारा पाने के लिए!” इतना सुनते ही नमन माथा पकड़कर बैठ गया। उसे कुछ भी नहीं सूझा। उसके मन में वायरस का इतना डर बैठ गया कि वो अपग्रेड करता चला गया।

Trojans, bots, back doors, adware इन सबसे बचने के लिए नमन को कई अपडेट करने पड़े। आखिर में जब उसने हिसाब लगाया तो वो अब तक 25000/- लुटा बैठा था। उसे काटो तो खून नहीं! वो बस इतना कह पाया- “यार! तूने ठीक किया जो दस हज़ार दे के निकल गया। मेरी तो लुटिया डूब गई, इस एंटीवायरस के चक्कर में! अब मुझे थोड़ी देर के लिये अकेला छोड़ दे!” -कहते हुए उसने साकेत को बाहर भेजकर दरवाज़ा बंद कर लिया।



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