Wednesday, 20th September, 2017

चलते चलते

फुटबॉल को पॉपुलर बनाने के लिए विदेशी खिलाड़ियों के अजीब नाम बदलकर गोलू, पिंटू, छोटू किए जाएँगे

27, Aug 2017 By Ritesh Sinha

नयी दिल्ली. आजकल इंडिया में भी फुटबॉल के फैन तेज़ी से बढ़ रहे हैं, लेकिन फिर भी ये बात सच है कि, जितना लोकप्रिय इस खेल को होना चाहिए, यह अभी भी इंडिया में उतना लोकप्रिय नहीं हो पाया है। इसकी सबसे बड़ी वजह है विदेशी खिलाड़ियों के लंबे और अजीबो-गरीब नाम! जैसे कि Šime Vrsaljko और Ederson Santana de Moraes! इन नामों को बोलना और याद करना फ़ुटबॉल का वर्ल्ड कप जीतने से भी मुश्किल काम है।

Football Players
“चलो, अब बोल के दिखाओ ये नाम!”

इसी समस्या से निपटने के लिए केंद्र सरकार इन प्लेयर्स का नाम बदलकर थोड़ा इंडियन टाइप रखने पर विचार कर रही है। यानि उनका असली नाम तो वही रहेगा लेकिन सिर्फ इंडिया के लोग उन्हें चिंटू, मिंटू और गोलू वगैरह कहकर पुकारेंगे। रोनित आहूजा, जिसने कुछ दिनों पहले ही फुटबॉल देखना शुरू किया है, ने इस समस्या के बारे में फ़ेकिंग न्यूज़ को बताया कि, “मुझे तो कुछ मालूम नहीं था फुटबॉल के बारे में, अब दोस्तों के चक्कर में पड़कर मैंने भी देखना शुरू कर दिया। लेकिन यार इन लोगों के तो ऐसे-ऐसे नाम हैं बाई गॉड क्या बताऊँ! अब आपसे क्या छुपाना! Alexander Oxlade-Chamberlain का नाम रटने में मुझे तीन दिन लग गए। जैसे-तैसे मैंने इस बंदे का नाम याद किया ही था, कि İlkay Gündoğan साब से टक्कर हो गई। दो दिन से अब इसके नाम की स्पेलिंग याद कर रहा हूँ!”

“इन लोगों का नाम बदल देना चाहिए यार! ताकि हमें भी कुछ समझ में आए। अब आप ही बताओ! Wojciech Szczesny को इंडिया में अगर हम चुन्नी लाल कहना शुरू कर देंगे, तो आर्सेनल का क्या कुछ बिगड़ जाएगा? उसी तरह Anatoliy Tymoshchuk को अगर हम पप्पू कहना शुरू कर देंगे तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ेगा। हो सकता है सरल नाम रखने के बाद इंडिया के लोग भी ज्यादा फुटबॉल देखना शुरू कर दें!”

“सबके नाम सोनू, मोनू, छोटू, गोलू टाइप एकदम आसान होने चाहिए यार! वरना मैं फिर से क्रिकेट देखना शुरू कर दूंगा! उल्टे-सीधे नाम रटने के लिए पैदा नहीं हुआ हूँ मैं!” -रोनित ने थोड़ा गुस्सा होते हुए कहा।

वहीं, जो लोग पहले से फुटबॉल के फैन हैं, वे नाम बदले जाने का विरोध कर रहे हैं। रूपम वेदी नाम के युवक ने बताया कि, “क्या पागलों जैसी बातें कर रहे हो! नाम बदले जाने पर हमें कुछ मज़ा नहीं आएगा, क्योंकि इनका नाम रटने में पहले ही हम अपना खून-पसीना बहा चुके हैं। इसलिए जो भी नया बंदा फुटबॉल देखना चाहता है, उसे भी हमारी तरह कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी। फोकट में कुछ नहीं मिलता यहाँ समझे!”



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