Friday, 24th November, 2017

चलते चलते

पति ने बड़ी मुश्किल से बनाया नया घर, पत्नी ने इंटीरियर में फूँक दिए दोगुने पैसे

12, Nov 2017 By Ritesh Sinha

इंदौर. मनीष सिन्हा अपने सपनों का घर बनाने के लिए पिछले दस साल से पाई-पाई जोड़ रहा था, ताकि बैंक से होम लोन लेना ना पड़े। जब इतने पैसे इकट्ठे हो गए तो इस साल उसने ज़मीन लेकर घर बनाना शुरू कर दिया। पहले तो वो फ्लैट लेना चाहता था लेकिन बाद में सोचा कि बिल्डर से ‘डिब्बा’ खरीदने से अच्छा है, अपना घर खुद ही बना लिया जाए। इस तरह उनका घर बनना शुरू हो गया।

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गरिमा का ‘पर्पल थीम’ वाला ड्रॉइंग रूम

जब घर बनकर तैयार हुआ, तो अब बारी थी इंटीरियर की! इसी बीच मनीष को अपने ‘परधानी’ के पद से इस्तीफ़ा देना पड़ गया। हुआ यूँ कि उसकी पत्नी गरिमा ने उससे कहा कि “चलो जी! बहुत हो गया! अब घर को सजाने का काम मैं देखूंगी! आप अपने पद से इस्तीफ़ा दे दो!”

यह सुनकर मनीष ने कहा, “ऐसा कैसे हो सकता है? मैं भी इंटीरियर के बारे में थोड़ा बहुत जानता हूँ! तुमको ड्राइविंग सीट पर आने की जरूरत नहीं है!” लेकिन मनीष की एक ना चली और गरिमा ने ज़बरदस्ती टेक-ओवर कर लिया। “कुछ नहीं आता आपको! ‘नीले’ रंग को हरा कहते हो, और ‘हरे’ को नीला! ऐसे सजाओगे अपना घर! सुनो जी! आपको सीमेंट, रेत और गिट्टी ही सूट करता है! अब आगे का काम मैं देखूंगी!” -गरिमा ने अपना फ़ाइनल डिसीजन सुना दिया।

इसके बाद जो हुआ वो तो इतिहास ही बन गया। सबसे पहले गरिमा ने मोटी फीस देकर एक इंटीरियर डिजाइनर को किराए पर लिया और पानी की तरह पैसा बहाने लगी। पेंट, टाइल्स, मेट, गुलदस्ता, फर्नीचर, सब कुछ महंगा वाला खरीदा गया। नतीजा यह हुआ कि उसने इंटीरियर में ही दोगुने पैसे खर्च कर दिए। अब मनीष दिन भर सिर्फ एक काम करता है- “आँसूं बहाने का!”

फ़ेकिंग न्यूज़ को अपना दुखड़ा सुनाते हुए उन्होंने बताया कि “मैं जानता था कि ये सब होने वाला है, इसलिए मैं इस्तीफ़ा नहीं दे रहा था! मैं यहाँ एक-एक रुपया बचाने की सोचता हूँ और वो महँगी चीज़ आर्डर करने से पहले एक बार भी नहीं सोचती! पूरा बजट गड़बड़ा गया है मेरा! इतनी महँगी-महँगी चीज़ें खरीद रही है, जो मैं सपने में भी अफोर्ड नहीं कर सकता! ये देखिए, पांच सौ रुपए फीट वाला टाइल्स आर्डर किया है!” -कहते हुए वे कुछ बिल्स दिखाने लगे।

विशेषज्ञों का मानना है कि मनीष को ज्यादा लोड नहीं लेना चाहिए, ऐसा हर किसी के साथ होता है। घर बनाते समय जितने का बजट रहता है, उससे दोगुना खर्चा हो ही जाता है।



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