Sunday, 25th June, 2017
चलते चलते

केवल 98% अंक आने पर बाप ने बेटे को पीटकर घर से निकाला, कहा पढाई में नहीं है ध्यान

23, May 2016 By Pagla Ghoda

नई दिल्ली: सी.बी.एस.इ. के बारहवीं के नतीजे मानों कई छात्रों के लिए उनकी तेरहवीं की तरह साबित हुए| जहाँ कई छात्र फेल होने के कारण चप्पलों से धोए गए वहीँ कई छात्र लगभग अव्वल आने के बावजूद भी माँ बाप द्वारा नहीं बख्शे गए| दिल्ली के प्रीतम पूरा इलाके के सुकेश सुनके (नाम परिवर्तित) ने अपने सुपुत्र जयकेश की उस समय जमकर पिटाई की जब रिजल्ट चेक करने पर उसके अंक केवल 98% ही पाये गए| इस पिटाई के बाद जयकेश को उनके पिता ने धक्के मार कर घर से भी निकाल दिया| पेश है हमारे पत्रकार की जयकेश के पिता श्री सुकेश से बातचीत के कुछ अंश|

श्री सुकेश: देखिये भाई साहब हमने तो तीन चार बार रिजल्ट चेक कर लिया वेबसाइट पे, पर हर बार वही| मैंने अपने एक पडोसी के लैपटॉप पे भी चेक करवा लिया| साला 98% ही निकला| हमने तो भाई सर पीट लिया| हमारी एक्सपेक्टेशन तो 100% की थी| इसकी माँ तो तुरंत ही रोने लगी| मेरा भी तभी से मूड ऑफ है|

“मुझे मालूम ही था.. तू मेरा नाम ज़रूर डुबोएगा”

पत्रकार: और जयकेश, वो कैसा फील कर रहा है?

सुकेश: शर्मिंदा है| और क्या, सभी फैसिलिटी मिली हुई है साहब ज़ादे को तब भी इतनी कम परसेंटेज| बगल के शर्मा जी के बेटे के 98.2% आये हैं साहब| और पीछे वाली गली के कपूर साहब के बेटे के 97%, बताओ?

पत्रकार: लेकिन 97% तो 98% से कम है न|

सुकेश: तो भाईसाहब कपूर साहब के बेटे को बुखार था मैथ्स के पेपर वाले दिन| 104 डिग्री बुखार में वो लड़का पेपर लिख के आया था| पूरी परीक्षा के दौरान बीमार रहके भी वो लड़का 97% ले आया| और हमारे शहज़ादे अच्छे खासे मुस्टंडे होने के बावजूद सिर्फ 98%|

पत्रकार: आप जब स्कूल में थे, तो कितना परसेंटेज लाया करते थे?

सुकेश: अरे उस ज़माने में तो टीचर मार्क्स देते ही नहीं थे| बीस मार्क के सवाल में दस से ज़्यादा तो देने ही नहीं| लोग मास्टरजी को डब्बा देके आते थे कलाकन्द का तब जाके कहीं पास किये जाते थे| फिर भी उस ज़माने में मैंने 55% लाकर रिकॉर्ड तोड़ दिए थे| बाउजी ने मोहल्ले में आलू पूड़ी बटवाई थी भाईसाहब| खैर वो ज़माने कुछ और थे| हम में एक शर्म और लिहाज़ हुआ करता था| माँ बाप की इज़्ज़त हमारी इज़्ज़त होती थी| और इस लड़के ने तो हमारा नाम ही मिटटी में ही मिला दिया है|

पत्रकार: ऐसा क्यों कह रहे हैं?

सुकेश: और नहीं तो क्या, घर से बाहर निकलता हूँ तो लगता हैं मानों पीठ पीछे लोग हंस रहे हैं| कह रहे हैं ये देखो उस फेलियर लड़के का बाप जो केवल 98% ही ला पाया| ब्रेड अंडे लेने गुप्ता जी की दूकान पे गया तो वो भी एक कुटिल मुस्कान मुस्कुरा रहे थे| आफिस से मैंने सिक लीव ले ली है| किस मुहं से ऑफिस जाऊं, सभी को मालूम है रिज़ल्ट आने वाला था बच्चे का| पूछेंगे तो मैं क्या जवाब दूंगा? (कहते कहते सुकेश जी की आँखों में आंसू आ गए)

पत्रकार: हम्म.. सुना है आपने बेटे को घर से निकाल दिया है|

सुकेश: क्या करता, गुस्से में हाथ उठ गया, और निकाल दिया| पर है तो अपनी ही औलाद, लौट कर परिंदा घोंसले में ही आता है, आ जायेगा वापिस|

पत्रकार: ठीक है सुकेश जी अब हम इजाज़त लेंगे|

सुकेश: अरे ऐसे कैसे, कुछ चाय वगैरह| अजी सुनती हो, क्या कर रही हो किचन में तबसे| कुछ चाय नमकीन लेके आओ भाई|

पत्रकार: नहीं नहीं तकल्लुफ की कोई बात नहीं, एक और जगह जाना है|

सुकेश: हाँ जी रिजल्ट आया है, कई जगह बच्चे अव्वल आये होंगे| उनके इंटरव्यू लेके छापिए, ताकि हमारे नालायक बच्चे को भी कुछ प्रेरणा मिले|

पत्रकार: जी|

सुकेश: और सुनिए, आपसे एक गुज़ारिश है| मेरा नाम बदल कर छापियेगा| दोस्त रिश्तेदारों में तो काफी बेइज़्ज़ती हो चुकी है| पूरी दुनिए में नहीं करवाना चाहता|

पत्रकार: जी ज़रूर|



ऐसी अन्य ख़बरें