Thursday, 21st September, 2017

चलते चलते

गाड़ियों के टकराने पर भी नहीं लड़े दिल्ली में दो ड्राइवर, भीड़ ने दोनों को धोया

23, Jun 2017 By नास्त्रेदमस

नयी दिल्ली. देश की राजधानी में अगर आपकी गाड़ी किसी की गाड़ी से टकरा जाये और वो बंदा आप से कुछ भी ना कहे, ऐसा कभी होता है क्या! लेकिन आईटीओ पर कल एक ऐसी ही हैरतअंगेज़ घटना हो गयी। दिल्ली के इस सबसे व्यस्त चौराहे पर कल दो बंदों की कारें टकरा गईं लेकिन इसके बावजूद वे आपस में नहीं लड़े, यहाँ तक कि उन्होंने एक-दूसरे को गालियाँ भी नहीं दीं।

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दोनों गाड़ी वालों की धुलाई करते लोग

भिड़ंत बहुत हल्की सी थी, गाड़ी को मामूली स्क्रैच छोड़कर बाकी किसी को कोई नुकसान नहीं हुआ, लेकिन गाड़ी का भिड़ना तो भिड़ना होता है, इसमें छोटा-बड़ा क्या होता है! इसलिये भीड़ यह सोचकर थोड़ी देर इंतज़ार करती रही कि अभी कुछ मार-धाड़ देखने को मिलेगी लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। वे दोनों कार से बेसबॉल का बल्ला निकालकर एक-दूसरे का सर फोड़ने के बजाय आपस में माफ़ी मांगने लगे। दोनों के दोनों “I am so sorry!” और “are you all right?” जैसे अजीब शब्द बोलने लगे। जिन्हें सुनकर आजू-बाजू खड़े लोगों को बहुत बुरा लगा।

भीड़ में से एक वालंटियर भिड़े लाल ने आ के गुप्ता जी, जो कि उन दोनों गाड़ियों में से एक के चालक थे, से कहा- “आप की गाड़ी को इस आदमी नै पीछे से ठोक दिया और आप सॉरी बोल रहे हो!” गुप्ता जी ने कहा “its ok! गलती मेरी ही थी, वो कुत्ता एकदम से गाड़ी के सामने आ गया तो मुझे ब्रेक मारने पड़े और उनकी गाड़ी पीछे से टकरा गयी।”

उतने में ही भीड़ से एक दूसरा वालंटियर हमेश भिड़े निकला और शर्मा जी, जो कि दूसरी गाड़ी के चालक थे, से बोला कि “अब तो इसने मान लिया कि गलती इसकी थी, फिर अब क्यूँ नहीं इसे कुछ बोलते?”, इस पर शर्मा जी ने कहा- “नहीं भाईसाब, मेरी भी गलती थी मुझे गाड़ी थोड़ी धीरे चलानी चाहिये थी।”

अपनी गाड़ियों के प्रति इतनी असंवेदनशीलता देखकर भीड़ में झुंझलाहट और बेचैनी बढ़ने लगी। थकी-हारी और अपने हाथ गर्म करने के लिये आतुर खड़ी उस भीड़ ने सोचा कि इन डरपोकों से कुछ नहीं होगा, अब तो हमें ही कुछ करना पड़ेगा। इसके बाद कुछ लोग गुप्ता जी की तरफ से हो गये और कुछ शर्मा जी की तरफ से और आपस में गाली-गलौच करने लगे। शर्मा जी और गुप्ता जी ‘Its ok’ और ‘its all right‘ करते रह गये और भीड़ ने उन्हें सूतना शुरू कर दिया। देखते ही देखते भीड़ ने उनसे उनकी असंवेदनशीलता का बदला ले लिया।

हमारा रिपोर्टर जब मौके पर पहुंचा, तब तक शर्मा जी और गुप्ता जी अस्पताल पहुंच चुके थे और भीड़, भीड़ में कहीं गुम हो गयी थी। उनकी स्क्रैचियाई कारों के शीशों से लेकर टायर तक सब कुछ फूट-फाट चुके थे। रिपोर्टर ने जब पास की दुकान वाले से पूछा कि आखिर हुआ क्या था तो उसने कहा, “मामला असंवेदनशीलता का था जी! जो लोग अपनी गाड़ियों के प्रति संवेदनशील नहीं हैं, वे देश के लिये क्या होंगे! इसलिए देश की जनता ने उन्हें सज़ा दे दी।” “क्या आप भी थे उन्हें पीटने वालों में?” तो वो दाँत फाड़ते हुए बोले- “नहीं जी, हम नहीं थे…वो तो भीड़ थी!”



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