Monday, 1st May, 2017
चलते चलते

होली आते ही बिहार के 'भौजाई' समुदाय के मन में डर समाया, छुपने की जगह ढूंढने में लगीं सब

22, Mar 2016 By बगुला भगत

पटना. जैसे-जैसे होली नज़दीक आती जा रही है, बिहार के भौजाई समुदाय के मन में डर बैठता जा रहा। इस डर की वजह से अनेक भौजाईयां ससुराल से अपने मायके पलायन कर चुकी हैं। जो कहीं नहीं जा पायी हैं, वे किसी अन्य सुरक्षित ठिकाने की तलाश में हैं। सुरक्षा के लिये घरों के कुंडी-ताले ठीक कराये जा रहे हैं।

Devra_Bhail_Deewana
होली पर ‘दीवाना’ बना ‘देवर’

वैसे तो होली के दिन बिहार में किसी भी उम्र की भौजाई ख़ुद को सुरक्षित नहीं मान सकती लेकिन सबसे ज़्यादा ख़तरा 18 से 38 की आयु वर्ग वाली भौजाईयों को होता है। यह ख़तरा इन्हें ‘देवर’ नाम की प्रजाति से होता है। बिहार समेत पूरे उत्तर भारत में यह प्रजाति महिलाओं के लिये सबसे घातक मानी जाती है, जो होली के मौक़े पर और भी ख़तरनाक हो जाती है।

देश के इस हिस्से में भिन्न-भिन्न शक्लों और साइज़ों के देवर पूरे साल ताक में बैठे रहते हैं। वे अपने मोहल्ले या रिश्तेदारी में एक महीना पहले ही अपना शिकार चिन्हित कर लेते हैं और उसी हिसाब से अपनी रणनीति बनाना शुरु कर देते हैं।

कुछ देवर सीरियल किलर की तरह ‘सीरियल-छेड़ू’ होते हैं, जो एक-एक करके पूरे मौहल्ले की भौजाइयों को अपना शिकार बनाते हैं। वे पहले से ताड़ कर रखते हैं कि किसको, कब, कैसे और कहां रंग लगाना है। जिन देवरों की संभावित शिकार मामा-बुआ या किसी अन्य रिश्तेदारी में होती है, वे पहले से ही वहां जाने का पूरा प्लान बनाकर रखते हैं। रंग, पानी और गोबर इनके मुख्य हथियार होते हैं।

अपनी 60 साल की ज़िंदगी में देवरों के ऐसे कई हमले झेल चुकीं अशरफी देवी बताती हैं कि “देवर के भेस में कई बार तो हमें ऐसे लोग भी छेड़ जाते हैं, जिनके हम भौजाई भी नहीं लगते। और हमारा किस्मत देखो! हमें उन्हें पूड़ी-कचौड़ी भी खिलाना पड़ता है।” -भूसे की कोठरी में छुपने की जगह ढूंढती अशरफी ने कहा।



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