Monday, 26th June, 2017
चलते चलते

आजकल के गेमर भुला चुके हैं कोंट्रा और मारिओ के सादे दिनों को, एक बूढ़े गेमर का दुखी व्यतांत

01, Dec 2015 By Pagla Ghoda

नई दिल्ली : एक समय joji1729 के नाम से मशहूर गेमर जयदीप जिनेन्द्र आज अकेलेपन और गरीबी की ज़िन्दगी काटने पर मजबूर हैं| शकूर बस्ती इलाके की एक हाउसिंग सोसाइटी में अपने ३ बैडरूम फ्लैट में एक गद्दा, और एक कुर्सी लगाये साठ वर्षीय जयदीप आज भी मारिओ की धुन गुनगुनाते हैं और कोंट्रा की यादों में खो जाते हैं|

“अगर कोई अच्छे दिन है तो वो यही थे..यही थे..”: जयदीप

ज़ोर से खांसते हुए जयदीप ने बताया, “उन दिनों में पंद्रह साल का हुआ करता था जब ये वीडियो गेम्स भारत में नयी नयी आई थी, किसी किसी के पास ही होती थी ये| पूरा दिन मैं और मेरा भाई शैंटी कोंट्रा, स्ट्रीट फाइटर और मारिओ खेलते थे| ये एक्स बॉक्स, सोनी उस समय कहाँ थे साहब| एक एक रूपये के सिक्का डाला करते थे मशीनों में| पहले पहले तो बहुत पैसा बर्बाद किया| पर बाद में एक्सपर्ट हो गए तो दो रूपये में दो दो घंटे खेल लिया करते थे| बीस बीस राउंड क्लियर कर डालते थे भाईसाब जी| वीडियो गेम वाले भैया तो हमें देख के ऐसा मुहं बनाते थे के जैसे बवासीर के साथ दस्त भी हो गए हों| वो भी खुशनुमा और सीधे सच्चे दिन हुआ करते थे|”

कुछ घूंठ पानी पीकर जयदीप फिर बोले, “आजकल तो देखिये पचासों गेम्स आ गए हैं, बढ़िया ग्राफ़िक्स, अच्छी टेक्नोलॉजी, स्ट्रैटजी गेम्स इत्यादि| कुछ खेले हैं मैंने भी, पर कुछ मज़ा नहीं आया| ग्राफ़िक्स शानदार हैं, टूल्स बढ़िया हैं, पर वो हार्डकोर गेमर वाली बात नहीं हैं| प्लेयर आउट होने का भाईसाहब हम लोगों में डर हुआ करता था| कठिन राउंड में हाथ काँप जाया करता था, के बस अब सिक्के खत्म हो गए, मम्मी और नहीं देगी| आजकल तो बस खेलते जाओ खेलते जाओ, कोई अंत नहीं| आज के गेमरस में वो डर, वो खौफ और वो डिसिप्लिन नहीं, जो हमारे ज़माने में हुआ करते थे| बहुत दुःख होता है इन भटके हुए बच्चों को देखकर|” – कहते कहते जयदीप की आँखें भर आयीं| खुद को थोड़ा संभाल कर जयदीप किचन में जाकर चाय बनाने लगे|

चाय बनाते बनाते भी जयदीप मारिओ की वही धुन गुनगुना रहे थे| एकदम से रूककर एक फीकी सी मुस्कराहट के साथ बोले – “गर्मियों की छुट्टियों में मम्मी, मासी रसना बनाती थी, और हम पूरा दिन कभी वीडियो गेम्स खेलते तो कभी लूडो सांप सीढ़ी, कहाँ चले गए वो सादे दिन? उस दिन एक बच्चे को मोबाइल फ़ोन में सुडोकु खेलते देख के लगा के शायद ज़माना बहुत अगले निकल गया है और हम मानों किसी बीते हुए ज़माने के खंडहर बन कर रह गए हैं|” – जयदीप ने हलके से आँखें मूँद ली और मारिओ की वही धुन गुनगुनाने लगे| प्याली में भरी चाय ठंडी हो रही थी, और सूरज भी उनके आँगन में ढल रहा था|



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