Saturday, 25th March, 2017
चलते चलते

राज्यसभा में एक दिन में दस से ज़्यादा मुहावरे नहीं सुना पायेंगे सिद्धू, पढ़िये क्यों

29, Apr 2016 By बगुला भगत

नयी दिल्ली. भूतपूर्व क्रिकेटर और मौजूदा कमेंटेटर एवं हास्य कलाकार नवजोत सिंह सिद्धू अब राज्यसभा में भी ठहाके लगाते दिखायी देंगे। हालांकि अभी यह तय नहीं है कि राज्यसभा को वो कितना समय दे पायेंगे लेकिन केंद्र सरकार को उम्मीद है कि “कपिल के कॉमेडी शो और आईपीएल में हंसने के बाद उनके पास जितना भी समय बचेगा, उसे वो राज्यसभा में ही देंगे।”

गुरुवार को राज्यसभा में जब शपथ लेने के लिये उन्हें बुलाया गया, तो शपथ लेने के बजाय वो स्वरचित शेर सुनाने लगे। सभापति हामिद अंसारी ने किसी तरह उन्हें क़ाबू में किया और जैसे-तैसे शपथ पूरी करायी। शपथ के तुरंत बाद अंसारी ने उनकी सीट के पास 4 एक्स्ट्रा मार्शल तैनात कर दिये। जो उनके हाथ से माइक छीनने, उन्हें ज़बरदस्ती बिठाने और ज़रूरत पड़ने पर उन्हें उठाकर सदन से बाहर ले जाने का काम करेंगे।

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सिद्धू का एक दुर्लभ फ़ोटो, जब वो कुछ सेकेंड के लिये चुप बैठे थे

हंसी के इस सरदार के लिये सभापति ने और क्या-क्या नियम तय किये हैं, लीजिये आप भी पढ़िये-

1) सिद्धू सभापति और उप-सभापति को ‘गुरु’ या ‘मोहतरमा’ कहकर संबोधित नहीं करेंगे।

2) उन्हें एक बार में सिर्फ़ पांच मिनट बोलने की इजाज़त मिलेगी, पांच मिनट पूरे होते ही मार्शल उन्हें ज़बरदस्ती बिठा देंगे।

3) एक दिन में वो दस से ज़्यादा मुहावरे नहीं सुनायेंगे।

4) उनका मुहावरा कम से कम 10 सांसदों की समझ में आना चाहिये, नहीं तो उसे सदन की कार्यवाही में शामिल नहीं किया जायेगा।

5) वो सिर्फ़ ज़रूरत पड़ने पर पर ही मेज थपथपाएंगे, बात-बात पर मेज पर ताली नहीं ठोकेंगे और ना ही पास में बैठे सांसद से ‘ठोको ताली’ बोलेंगे।

6) हंसने के लिये उन्हें अलग से कोई भत्ता नहीं मिलेगा और अगर वो अपने निर्धारित कोटे से ज़्यादा हंसे तो उनकी उस दिन की मैच-फीस ‘हाउस-फीस’ काट ली जायेगी।

7) राज्यसभा में वो बाक़ी सांसदों की तरह ही प्रवेश करेंगे ना कि बैंड-बाजे के साथ नाचते-गाते!

इतनी सारी पाबंदियों के साथ-साथ सभापति ने उन्हें एक आकर्षक ऑफ़र भी दिया है। अगर वो सदन में दस मिनट तक बिना हंसे या बिना उछले चुप बैठे रह पाये तो उन्हें साल का ‘सर्वश्रेष्ठ सांसद’ घोषित कर दिया जायेगा। लेकिन इस ऑफ़र के बावजूद राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ये पाबंदियां ‘शेर को घास खिलाने’ जैसी हैं।



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