Saturday, 23rd September, 2017

चलते चलते

आडवाणी ने खेला आख़िरी दाँव, कोविंद के शपथ लेने के 5 मिनट बाद ही बन गये दलित

26, Jul 2017 By बगुला भगत

नयी दिल्ली. इधर रामनाथ कोविंद ने राष्ट्रपति पद की शपथ ली और उधर पाँच मिनट बाद ही लालकृष्ण आडवाणी ने दलित जाति ग्रहण कर ली। उनके इस चौंकाने वाले फ़ैसले के पीछे तरह-तरह की वजहें बतायी जा रही हैं। कुछ राजनीतिक पंडितों का मानना है कि यह ‘जाति-परिवर्तन’ उन्होंने राष्ट्रपति बनने के लिये किया है। कोविंद को शपथ लेता देख आडवाणी जी के मुँह से निकला- “अगले जनम मोहे दलित ही कीजो!” यह दावा उनके बगल वाली कुर्सी पर बैठे बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता ने किया है।

Advani
इस मौक़े पर भावुक होते आडवाणी

जाने-माने राजनीतिक विश्लेषक जोगेंद्र जाधव का कहना है कि “आडवाणी जी को लगता है कि अगर वो दलित होते तो मोदी जी पक्का उन्हें ही राष्ट्रपति बनाते। लेकिन दलित वोटों के चक्कर में मोदी जी ने उनका पत्ता काट दिया। इस बात से दुखी होकर शुरु में तो वो शिवसेना की तरह चाह रहे थे कि दलितों का वोट देने का अधिकार ही छीन लेना चाहिये! ना रहेगा बाँस और ना बजेगी बाँसुरी!”

लेकिन फिर उन्हें लगा कि ऐसा होना तो असंभव है। तभी उन्हें अंग्रेज़ी की यह कहावत याद आयी- ‘if you can’t defeat them join them!’ उन्हें भी लगा कि अब अगर उनका राष्ट्रपति बनने का कोई चांस है तो वो दलित बनकर ही मिल सकता है।

उधर, आडवाणी जी ने इन सारी अटकलों को बेबुनियाद बताया है। उन्होंने कहा है कि “अरे…मेरी राष्ट्रपति बनने की कोई इच्छा नहीं है। मैं तो दलितों के अहसान का बदला चुकाना चाहता हूँ। दलित भाईयों ने बहनजी को सारी सीटों पर हराकर बीजेपी पर जो अहसान किया है, मैं तो बस उसे उतारना चाहता हूँ।”

विश्लेषकों का भी मानना है कि किसी सवर्ण व्यक्ति के दलित बनने का यह अपनी तरह का पहला मामला है। जैसे जाट और गुर्जर सरकारी जॉब के चक्कर में निचली जाति में आना चाहते हैं, उसी तरह आडवाणी जी भी देश के सबसे बड़े ‘सरकारी जॉब’ के लिये अब दलित बनना चाहते हैं।



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