Sunday, 22nd October, 2017

चलते चलते

बैंगलोर मेट्रो में हिंदी के साईनबोर्ड देख गोरखपुर के युवक को हुई घर जैसी फ़ीलिंग

05, Jul 2017 By आशीष कुमार

बैंगलोर. गार्डन सिटी की मेट्रो ट्रेन में हिंदी के साईनबोर्ड देखकर उत्तर भारत के एक युवक को बिल्कुल घर जैसा माहौल मिल रहा है। हाल ही में, अभिषेक श्रीवास्तव नाम का यह युवक जब दिल्ली से ट्रांसफ़र होकर बैंगलौर पहुँचा,तो उसे यकीन ही नहीं हुआ कि वो बैंगलोर में है। गोरखपुर का मूल निवासी होने की वजह से उसका मुँह हमेशा पान से लाल रहता था। मेट्रो का टिकट लेने से पहले उसने एक पान मुँह में दबाया और टिकट लेकर जैसे ही अन्दर पहुँचा, तो चारो तरह हिंदी के साईनबोर्ड देखकर कंफ्यूज हो गया कि मैं बैंगलोर पहुँच गया हूँ या अभी दिल्ली में ही हूँ!

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अभिषेक की घर जैसी फ़ीलिंग वाला स्टेशन

अभिषेक ने एक अच्छा सा कोना देखा और दीवार को पान की पीक से लाल कर दिया। दिल्ली में कई साल रहते हुए उसे इस बात की अच्छी प्रैक्टिस हो गयी थी कि सीसीटीवी की नज़र से बचकर कोई साफ़ सुथरा कोना ढूँढकर कैसे उसे रंग देना है। इस काम में वो इतना माहिर हो चुका था कि आज तक दिल्ली मेट्रो में कभी पकड़ा नहीं गया। जब उसे बताया गया कि उसका ट्रान्सफर बैंगलोर हो रहा है तो उसे तभी से ये चिंता सताये जा रही थी कि बैंगलोर में उसे पान का वो 300-120 का डैडली कॉम्बिनेशन मिलेगा कि नहीं!

पर जैसे ही उसने बैंगलोर में लैंड किया तो उसकी तो आँखें ही चौंधिया गयीं! दिल्ल्ली तो क्या बिल्कुल गोरखपुर और पटना जैसा माहौल था। पतंजलि के स्टोर, लिट्टी-चोखा, दाल-बाटी के स्टॉल तो इडली और डोसा से भी ज्यादा थे। हर रेस्टोरेंट में एक पान वाला खोमचा था, जहाँ बिलकुल ‘ऊपी वाला’ ही पान मिल रहा था। उसके आने से पहले बैंगलौर में मेट्रो की नयी लाइन शुरु की गयी थी, जहाँ हर तरफ़ हिंदी के साईनबोर्ड थे, सो उसे महसूस ही नहीं हुआ कि वो नॉर्थ में नहीं बल्कि साउथ में है। आने से पहले उसने सोचा था कि वो यहाँ आकर कन्नड़ सीखेगा पर यहाँ ओला-ऊबर में ज्यादातर ड्राइवर गोरखपुर के थे, सो वो उनसे मस्त आराम से भोजपुरी और मैथिली में बातें करता है।

उसके ऑफिस का भी ये आलम था कि तमिल और केरल के दोस्त तक आपस में हिंदी में बतिया रहे थे। और उसकी रही-सही चिंता भी तब दूर हो गयी, जब उसे बैंगलोर मेट्रो में हर तरफ हिंदी के साईनबोर्ड मिले। तभी से उसे फील हो रहा है कि वो गोरखपुर में ही घूम रहा है। अब वो आराम से घर के बगल वाली पान की गुमटी से एक 300-120 बंधवाता है और ऑफिस के लिए मेट्रो पकड़ता है, जहाँ वो मौक़ा मिलते ही एक कोना ढूँढ कर उसे लाल रंग में रंग देता है। बंगलौर मेट्रो के कर्मचारी अचंभे में हैं कि हमारी नयी मेट्रो के स्टेशनों की दीवारें आखिर अपने आप लाल कैसे हो रही हैं!



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