Tuesday, 24th April, 2018

चलते चलते

सुप्रीम कोर्ट के जजों ने जनता से कहा फ़ैसला सुनाने को; जनता ने 3 महीने के लिए टाली सुनवाई

14, Jan 2018 By Guest Patrakar

नयी दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने परसों अपने और चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा के बीच के मतभेदों पर जनता को फ़ैसला लेने को कहा था। जिसे जस्टिस मिश्रा ने भी मंज़ूर कर लिया। लेकिन मसला यह हुआ कि जनता ने इस पर तुरंत फ़ैसला लेने के बजाय कार्यवाही को तीन महीने के लिए टाल दिया है।

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जनता से फ़ैसला सुनाने की गुहार लगाते जज

जनता ने हर वर्ग से 2 लोगों को उठाकर दस लोगों की एक स्टैंडिंग कमिटी बनायी थी, जिसे फ़ैसला करना था कि जस्टिस मिश्रा अब चीफ़ जस्टिस रहेंगे या नहीं। लेकिन लोगों ने इस पर फ़ैसला लेना तो दूर, कार्यवाही तीन महीने के लिए टाल दी।

सुप्रीम कोर्ट के एक जज जस्टिस चंदू कटपिटिया ने फ़ेकिंग न्यूज़ से बात की और इस मामले पर अधिक रोशनी डाली। चंदू जी ने बताया “हाँ, यह सच है। हमने ही यह कमिटी बनवाई थी, लेकिन जब फ़ैसला करने का समय आया तो उन्होंने एक स्वर में यह कह दिया कि हम इस केस की कार्यवाही तीन महीने के लिए टालते हैं। ‘द कोर्ट विल कंटिन्यू द प्रोसिडिंग्स ऑन द नेक्स्ट हीयरिंग’! हमने इसका विरोध भी किया लेकिन उन्होंने हमें कन्टेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट में अंदर करने की धमकी दे कर चुप करा दिया।”

हमने स्टैंडिंग कमिटी के लीडर पिंटू मनसुखिया से बात की और उनका पक्ष जाना। पिंटू जी ने कहा “ऐसा नहीं है कि हमारे पास वक़्त नहीं है मगर हम इन जजों को भी वही महसूस कराना चाहते हैं, जो ये हमें महसूस कराते हैं। एक जज ने हमें बोला कि कोर्ट के पास समय नहीं है कृपया जल्दी फ़ैसला सुनाएं तो हमने भी बोल दिया कि समय हमारे पास भी नहीं होता है, लेकिन फिर भी हम सब काम छोड़कर हर तारीख़ पर हाज़िर होते हैं। जिसके बाद सारे जज चुपचाप बाहर निकल गए।”

माना जा रहा है कि अब यह कमिटी तीन महीनों में जजों पर फ़ैसला लेने के बजाय ताज महल किस रंग का होना चाहिए और कौन सा त्योहार किस तरह से मनाना चाहिए इसका फ़ैसले लेगी।

अनजाने में ही सही लेकिन जजों को भी पता चल गया होगा कि एक मजबूर माँ जिसकी बेटी के साथ तीन साल पहले बलात्कार हुआ था, जिसके लिए अब उसकी बेटी का न्याय ही सब कुछ है, उसे हर तारीख़ पर आकर बेआबरू होना कैसा लगता होगा? क्या वह न्याय की हक़दार नहीं है? क्या दिवाली के पटाखे और मकर संक्रान्ति पर पतंग पर रोक उस माँ को न्याय देने से ज़्यादा ज़रूरी है?



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