Sunday, 25th February, 2018

चलते चलते

पकौड़ों के साथ लोगों ने माँगा 'क्वार्टर', कड़ाही छोड़कर भाग गये नेताजी

09, Feb 2018 By बगुला भगत

लखनऊ. कहते हैं कि इंसान की इच्छाओं को कोई अंत नहीं है। अगर आप उन्हें फ्री में कार देने लगें तो वे साथ में पेट्रोल भी मांगने लगते हैं। कुछ ऐसा ही हुआ समाजवादी पार्टी के एक नेताजी के साथ! ये नेताजी, प्रधानमंत्री मोदी के पकौड़ा बयान के विरोध में ‘पकौड़ा प्रोटेस्ट’ करते हुए कल फ्री में पकौड़े बाँट रहे थे, जो उनको भारी पड़ गया।

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पकौड़ों के साथ पव्वा माँगते लोग

असल में, नेताजी से ग़लती ये हो गयी कि उन्होंने अपना ठेला शाम के टाइम लगाया। जैसे ही उन्होंने लोगों को पकौड़े थमाए तो लोग खाने के बजाय उन्हें हाथ में लेकर खड़े हो गये और नेताजी का मुँह ताकने लगे। नेताजी ने कहा “खाओ…खाओ! रिफाइंड में बनाए हैं।” लेकिन लोग फिर भी वैसे के वैसे ही खड़े रहे और इशारों-इशारों में कुछ और भी डिमांड करने लगे।

“कुछ और इंतज़ाम नहीं है क्या?” -अंगूठे से होंठों की तरफ़ इशारा करते हुए एक बंदे ने पूछा। “मतलब?” -नेताजी अचंभे से बोले। “मतलब ये कि खाली पकौड़े ही खिलाओगे या इनके साथ ‘कुछ और’ भी मिलेगा?” उसने दोबारा इशारा किया तो नेताजी समझ गये कि भाईसाब क्या चाहते हैं!

वो उस बंदे को साइड में ले गये और धीरे से बोले, “बेटा, अगर इलेक्शन होता तो क्वार्टर क्या पूरी बोतल दे देते। तुम्हें यहाँ आने की ज़रूरत भी नहीं पड़ती, तु्म्हारे घर पे ही पहुँचा देते!” फिर उसकी हथेली पे रखे पकौड़े को उसके मुँह में ठूँसते हुए बोले, “अब चार साल तक कोई इलेक्शन नहीं हैं। इसलिए पकौड़े मिल रहे हैं, इसी में शुक्र मनाओ। खाओ और चुपचाप घर को जाओ! चलो फूटो!”

यह देख कुछ लोगों ने पकौड़ों की पुड़िया बनाकर जेब में डाली और कहीं और ‘इंतज़ाम’ की तलाश में निकल लिए, जिन्हें कहीं भी ‘इंतज़ाम’ की उम्मीद नहीं थी, वे “नेताजी हाय-हाय” के नारे लगाने लगे। माहौल बिगड़ता देख नेताजी ने कड़ाही और बेसन वहीं छोड़ा और चेले-चपाटों समेत अपनी फ़ॉर्च्यूनर में बैठकर चौड़ी गली से खिसक लिए।



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