Wednesday, 20th September, 2017

चलते चलते

फेसबुक पर नोटबंदी-डिबेट जीतने हेतु युवक ने छोड़ी नौकरी, दिन-रात पढ़ता है इकोनॉमिक्स की किताबें

05, Sep 2017 By Pagla Ghoda

गुरुग्राम. चप्पल-कार्ट डॉट कॉम में काम कर रहे सॉफ्टवेयर इंजीनियर फणीश फटफटीवाला ने अपनी मल्टी मिलियन डॉलर हाई पेइंग जॉब छोड़कर अब इकोनॉमिस्ट बनने का फैसला किया है। दरअसल फेसबुक पर नोटबंदी सम्बंधित डिबेट्स में अपने मित्रों से बार-बार हारने से दुखी होकर फणीश ने ये कड़ा फैसला लिया है।

Guy Reading Economics
नोटबंदी के नफ़ा-नुकसान समझता फ़णीश

रोनी सूरत बनाते हुए फणीश ने कहा, “दो महीने पहले जब मैंने नोटबंदी का विरोध किया तो लोगों ने मुझे ‘सिकुलर’ कहकर इकोनॉमिक्स के कुछ फंडे पेल कर चुप करा दिया था। अब कल जब मैंने नोटबंदी की तारीफ करनी चाही तो लोगों ने मुझे ‘अंध भक्त’ करार देकर फिर कुछ इकोनॉमिक्स का ज्ञान बांच कर चुप करा दिया। और सबसे बड़ी चोट तो मुझे तब लगी जब मेरी एक्स ऋचा रोल्सरॉयसवाला ने भी मुझे नोटबंदी पर कुछ फंडे दे डाले। अजी, हद्द होती है किसी चीज़ की, अब तो मैं इकोनॉमिक्स में पी.एच.डी. करके ही रहूँगा।”

जहाँ फणीश ऑनलाइन आर्डर करके इकोनॉमिक्स और फाइनेंस की लगभग बीस किताबें मंगा चुका है और रोज़ाना करीबन तीन सौ पेज प्रिंटआउट निकाल के पढ़ने लगा है, वहीँ कई मनोवैज्ञानिक इस तरह के व्यवहार को एक नए तरीके के डिसऑर्डर का नाम दे रहे हैं।

मशहूर मनोवैज्ञानिक श्री चंद्रेश चपातीवाला ने इस विषय में कहा, “दरअसल ज़ुकरबर्ग को फेसबुक पेज के सबसे टॉप पे लिखवा देना चाहिए के “यहाँ ज्ञान ना बाटें, यहाँ सभी ज्ञानी हैं।” लेकिन ऐसा तो वो करने से रहा, इसलिए फेसबुक पे रोज़ाना काफी बहसबाज़ी होती रहती है। कई बार तो दोनों पक्षों के लोगों को उस विषय का रत्ती भर भी ज्ञान नहीं होता फिर भी खुद को लीडर साबित करने से वे बाज़ नहीं आते। जातिवाद, पॉलिटिक्स और नोटबंदी पर रोज़ाना लाखों बहसें होती हैं। वैसे, देश में बहस का कल्चर होना कोई गलत बात नहीं, मुद्दों पे बहस अवश्य होनी चाहिए। पर जब नोटबंदी के हक़ में कोई बच्चा फेसबुक पे ये पोस्ट कर देता है के “न्यू नोट्स लुक सो कूल ऐंड कलरफुल” तो मन करता है कि मैं भी मनोविज्ञान छोड़कर अर्थशास्त्री बन जाऊं क़सम से!”



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