Thursday, 18th January, 2018

चलते चलते

जंगल में कछुए और ख़रगोश गुटों में हिंसा

06, Jan 2018 By Saquib Salim

महावन. जंगल के महावन प्रदेश को हिंसा ने आज उस समय अपनी चपेट में ले लिया जब की कछुओं का एक बड़ा समूह अपने पूर्वज ‘कछुआ बाबा’ की ‘ख़रगोश राव’ पर जीत का दो सौंवा वर्ष मना रहा था।

गौरतलब रहे की स्कूल में पढ़ाई जाने वाली पुस्तकों से ये जान पड़ता है की आज से दो सौ वर्ष पहले ‘कछुआ बाबा’ ने ‘ख़रगोश राव’ को एक दौड़ने की स्पर्धा में मात दे दी थी। उस ही कहानी से ये भी ज्ञात होता है की कछुए का ख़रगोश से जीतना इस से पहले तक नामुमकिन माना जाता था। सदियों से कछुआ बेचारा ख़रगोश के इशारों पर नाच रहा था परन्तु उस दिन उसने ख़रगोश को चैलेंज कर ही दिया, ख़रगोश ने कछुए को दौड़ने की एक शर्त लगायी और कछुए ने स्वीकार कर ली।

जीतेगा कौन ?
जीतेगा कौन ?

ख़रगोश तब तक ये नहीं जानता था की ज़माना बदल चुका है, अब केवल तेज़ दौड़ना ही काफी नहीं है। अब तो नयी नयी टेक्नोलॉजी भी आपको स्पर्धा जिताने में सहयोग करती हैं. ख़रगोश ठहरा वही पुराने ख़यालों वाला, दकियानूस. उसने ऐसे ही आनन फ़ानन दौड़ना शुरू कर दिया. दौड़ता वो तेज़ था, परन्तु कुछ देर में थक भी गया और सोचा की बहुत आगे आ चुका हूँ सो कुछ देर आराम किया जाये. और ख़रगोश आराम करने लगा।

दूसरी ओर कछुआ परेशान था की क्या करे तो उसको एक दुसरे जंगल की लोमड़ी मिली. लोमड़ी का दावा था कि वो एक व्यापारी है। इस लोमड़ी ने कहा की वो कछुए को जिता सकती है अगर वो उसका सामान ख़रीद ले तो ये लोमड़ी अपने साथ एक ख़ास प्रकार के जूते लायी थी, जिसे पहन कर वो ख़रगोश से भी तेज़ दौड़ सकता था। इसने उसको एक यंत्र दिया ताकि वो एक छोटा रास्ता ढूंढ़ कर ख़रगोश से पहले मंज़िल तक पहुँच जाये।

अब कछुआ ख़ुश था, और लोमड़ी और भी ख़ुश. क्योंकि लोमड़ी ने शर्त रखी थी की अगर कछुआ जीत गया तो वो ख़रगोश से ली गयी सारी संम्पत्ति लोमड़ी को दे देगा. क्योंकि लोमड़ी के अनुसार अभी कछुए को संपत्ति रखना आता ही नहीं था।

और इसके साथ ही कछुआ दौड़ा और नयी टेक्नोलॉजी की मदद से उसने ख़रगोश को हरा दिया. ख़रगोश और उसके साथ ‘राजा शेर’ जिसके यहाँ वो प्रधानमंत्री था को अपना सब कुछ लोमड़ी के हवाले करना पड़ा। कछुआ ख़ुश था कि अब वो ख़रगोश का नहीं लोमड़ी का नौकर था. लोमड़ी सात समंदर पार के जंगल से आई थी, उसने कहा की अब से सारे जानवर बराबर होंगे, हाँ लोमड़ी की ग़ुलामी सब को करनी होगी।

इसके साथ ही कछुआ जो पहले ख़रगोश का ग़ुलाम था अब लोमड़ी का ग़ुलाम हो गया और ख़रगोश भी अब लोमड़ी का ग़ुलाम था. अब सब बराबर थे क्योंकि सब ग़ुलाम थे।

कुछ साल और बीते जंगल के जानवरों को समझ आया की लोमड़ी ने अपनी चालाकी से उन्हें आपस में लड़ा दिया है और सब को ग़ुलाम बना दिया है. ऐसे में जंगल के अलग अलग जानवर साथ आये और उन्होंने इस लोमड़ी को जंगल से खदेड़ दिया।

तब से हर साल कछुए के वंशज ख़रगोश की हार का जश्न मनाते हैं. इस साल इस समारोह पर ख़रगोश के वंशजों ने ये कह कर हमला कर दिया की ये कछुए की नहीं बल्कि लोमड़ी की जीत थी और लोमड़ी सात समंदर पार से आई थी जिसने हमें ग़ुलाम बनाया था, उनका एक आरोप ये भी था की इस समारोह में कछुआ समुदाय को ख़रगोश समुदाय के ख़िलाफ़ भड़काने के लिये लाल तोते आये हुए थे। ये तोते जंगल की राजधानी में धरना देने का काम करते हैं. दूसरी और कछुआ समुदाय का कहना है की ख़रगोश समुदाय उनको एक बार फिर ग़ुलाम बनाना चाहता है और लाल तोतों के भाषण क़तई भड़काऊ नहीं थे।

इस के बाद हुए प्रदर्शन में हुई हिंसा में विभिन्न जानवरों के, जिनका ख़रगोश और कछुआ समुदाय दोनों से कुछ लेना देना नहीं था, कई वाहन क्षतिग्रस्त हो गए.

इस बीच कुछ केसरिया तोते भी जंगल में सक्रिय हो गए हैं, उनका कहना है की लाल तोते ही सारे फ़साद की जड़ हैं जबकि कछुआ समुदाय और लाल तोतों का आरोप केसरिया तोतों पर है.

महावन प्रदेश में स्थिति अभी भी तनावपूर्ण बनी हुई है और लाल एवं केसरिया तोते प्रदेश और जंगल की राजधानी में अपने ए.सी घरों में टी.वी देख रहे हैं।



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