Wednesday, 26th April, 2017
चलते चलते

'बार बार देखो' को एक बार देखने से ही युवक ने मानसिक संतुलन खोया, पागलखाने में भर्ती कराया गया

12, Sep 2016 By Hemant Bijapurkar

बनारस. शहर के लंका मोहल्ले का युवक त्रिलोचन त्रिपाठी दो महीने से करण जौहर की फ़िल्म ‘बार बार देखो’ को देखने का प्लान बनाये बैठा था। त्रिलोचन भाई अपने यार-दोस्तों से रोज़ कहे थे कि “भाई ‘बार बार देखो’ कम से कम दो-चार बार तो देखनी ही पड़ेगी।” वो सुबह-शाम ‘तैनूं काला चश्मा’ गाते घूम रहे थे।

Baar Baar
पहली बार में ही अचेतावस्था में पड़े त्रिलोचन बाबू

तो शुक्रवार को जैसे ही फ़िल्म रिलीज़ हुई तो त्रिलोचन भाई फ़र्स्ट डे फ़र्स्ट शो में घुस गये,। घर से जाते-जाते बोले- “सैटरडे, संडे के शो भी पक्के!” लेकिन पहले दिन ही सिनेमा हॉल के अंदर जो हुआ, त्रिलोचन आज उसे याद करने की हालत में भी नहीं हैं।

मोहल्ले के लोगों के मुताबिक तिरलू (त्रिलोचन भाई का प्यार का नाम) को ज़िंदगी में कोई और काम धंधा नहीं था। वो हमेशा ज़रूरत से ज़्यादा बहादुरी दिखाता रहता था। लोग जिस फ़िल्म के नाम से ही डर जाते थे, वो उस फ़िल्म में भी हंसता-हंसता घुस जाता था। लेकिन ये बहादुरी इस बार तिरलू पर भारी पड़ गयी। वो सिनेमा हॉल में घुसा तो ठीक-ठाक हालत में लेकिन बाहर आया अचेतावस्था में!

उसके आस-पास की सीटों पर बैठे कुछ संवेदनशील और नेक इंसानों ने उसे नज़दीकी अस्पताल में भर्ती कराया, जहां से उसे आगरे के पागलखाने के लिये रेफ़र कर दिया गया। हमने तिरलू के घनिष्ठ मित्र मनोहर मिश्रा से जानने की कोशिश की कि उसने ऐसा रिस्क क्यों लिया और किसी ने उसे रोकने की कोशिश क्यों नहीं की?

ये है मिश्रा जी के मुंह से पूरी कहानी- “देखिए, तिरलू करण जौहर और आदित्य चोपड़ा का बहुत बड़ा फैन है। जब उसने ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे’ देखी तो अपने खेत में चावल की जगह सरसों उगानी शुरु कर दी और जब ‘स्टूडेंट ऑफ़ दि ईयर’ देखी तो अपनी लॉन्ग टाइम क्रश को आल्या कहकर बुलाने लगा। तो जब उसने इस मूवी का टाइटल ‘बार बार देखो’ देखा, तो इसे बार-बार देखने का प्लान बना लिया। इसी चक्कर में ये कांड हो गया।”

हमने जब डॉक्टर से इस बारे में बात की तो उन्होंने कहा, “देखिए त्रिलोचन जैसे इस देश में काफी युवक हैं, जिनकी ज़िन्दगी बॉलीवुड के चक्कर में झंड हो गई है। फिलहाल हमने उसे स्पेशल बॉलीवुड वार्ड में रखा है, जहां ‘हिम्मतवाला’, ‘तीस मार खां’ और ‘हमशक्ल’ जैसी फिल्मों के शिकार हुए मरीज़ भर्ती हैं। हमारे यहाँ कुछ मरीज़ ऐसे भी हैं, जो ‘इंटरस्टेलर’ और ‘इन्सेप्शन’ को 100 बार देख कर भी नहीं समझ पाए और अपना मानसिक संतुलन खो बैठे।” इतना कहकर डॉक्टर साब त्रिलोचन को बिजली के झटके देने आईसीयू में चले गये।



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