Tuesday, 28th February, 2017
चलते चलते

गोलियों से छलनी होने पर भी हीरो का दोस्त डायलॉग पूरा करके ही मरता था, वो थे अच्छे दिन

03, Jan 2017 By Pagla Ghoda

मुम्बई. अगर हम अस्सी-नब्बे के दशक की फिल्मों को याद करें तो बस आँखें भर आती हैं। नकली स्टेनगन वाली गोलियों से मरते विलेन के लाखों गुंडे और छलांग लगाकर गोलियों से बचते जाबांज़ हीरो! और आखिर में विलेन का पूरा आइलैंड तबाह करके दो हीरो और उनकी हीरोइन बोट से भाग जाया करते थे। किसी एक-आध फिल्म में हीरो की माँ और बहन भी इन्वॉल्व्ड रहते थे। और सबसे दर्दनाक सीन होता था जब विलेन की कई गोलियां खाने के बाद भी हीरो का दोस्त अपना पूरा डायलॉग खत्म करके ही प्राण त्यागता था।

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अपना 15 मिनट का डायलॉग पूरा करता हीरो का दोस्त

फिल्म विशेषज्ञ छप्पननाथ जी इस विषय पर कहते हैं, “आम तौर पर सीन कुछ ऐसा होता था कि हीरो डॉक्टर डैंग या डोंगरीला के डाँग के लाल-काली वर्दी पहने गुंडों पर गोलियां बरसा रहा होता था या उनसे ढिशुम-ढिशुम कर रहा होता था। देश के दुश्मनों से जंग होने का माहौल होता था तो ऑडियंस में बैठे लोग वैसे ही काफी सेंटी हो जाते थे। इतने में विलेन का कोई छोटा साईडी विलेन जैसे कि मैकमोहन या रणजीत टाइप का कोई, हीरो पर छिप के गोली चलाने की फिराक में होता था, जिसे हीरो का दोस्त देख लेता था। अब ये हीरो का दोस्त आमतौर पर कोई छुटपुट एक्टर ही होता था तो एक्शन मूवी के शुरू में ही हमें पता होता था कि ये तो मूवी में मरेगा ही, पर कब, ये पता नहीं!”

“तो ये हीरो का दोस्त जब ये देखता था, तो बजाय हीरो को चेताने के, या मैकमोहन पे गोली चलाने के, वो खुद ही बीच में आकर गोली खुद पर ले लेता था और अपनी जान की कुर्बानी दे देता था और हीरो बच जाता था। गोली लगने पर भी और काफी खून बहने पर भी वो दोस्त आसानी से अपने प्राण नहीं त्यागता था। अपना डायलाग धीरे-धीरे कब्ज़ हुए तरीके से बोलके ही मरता था। जैसे कि मेरे बाद मेरे माता-पिता का ध्यान रखना या फिर मेरे देश की रक्षा करना इत्यादि। और फिर एकदम स्टाइल से झटके से मरता था। और फिर कैमरा का फोकस हीरो की आँखों पे होता था, जिनमें अब प्रतिशोध की जवाला जल रही होती थी। और पूरी ऑडियंस भी अब चाहती थी कि हीरो अब तो विलेन का सर्वनाश ही कर दे। जैसे शोले में जय के मरते ही वीरू गब्बर के खून का प्यासा हो जाता है। उसी वक़्त गब्बर के डायलॉग पर तालियां बजाने वाली ऑडियंस भी अब उसका अंत ही चाहती है।”

“लेकिन आजकल हीरो के दोस्त की मृत्यु वाला कांसेप्ट कुछ ख़तम सा हो चला है। अब तो ये हाल है कि अक्षय कुमार, अजय देवगन या तीनों खानों की एक्शन मूवीज़ में भी उनके सब साइड एक्टर लगभग बच ही जाते हैं। अब वो अच्छे दिन नहीं रहे, जब फिल्म निर्देशक, हीरो के दोस्त की कुर्बानी देकर ऑडियंस से एक रिश्ता सा जोड़ लेते था। आजकल तो एक्शन ही सब कुछ है साहब, इमोशन के लिए कोई जगह ही नहीं बची!”



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