Sunday, 25th June, 2017
चलते चलते

फ़ेकिंग फ़िल्म रिव्यूः वजह तुम हो

16, Dec 2016 By बगुला भगत

इस गंद के बनने की ‘वजह तुम हो’ मोदी जी! अगर ये नोटबंदी कुछ दिन पहले कर दी होती तो ये हमारी तरह इसके प्रोड्यसरों के पास भी पैसे ना होते और ये फिलिम भी ना बन पाती और दर्शक इस ‘सरदर्द की वजह’ से बच जाते। इस फिलिम में दर्शक सिर्फ़ तभी रुकेंगे, जब राष्ट्र-गान पे ही नहीं, पूरी फिलिम में दरवाज़े बंद रक्खे जायेंगे। शरमन जोशी को ऐसी फ़िल्म करनी पड़ रही है, इसके ज़िम्मेदार भी मोदी जी ही हैं, उनकी नोटबंदी ने बेरोज़गारी इतनी बढ़ा दी है कि बंदा हरभजन की तरह ए-ग्रेड से सीधा बी-ग्रेड में पहुंच गया।

Wajah Tum Ho1
दोनों वकील एकांत में बहस करते हुए

तो जी, इस ‘तथाकथित’ क्राइम थ्रिलर की कहानी ये है कि राहुल ओबेरॉय (रजनीश दुग्गल) ‘ग्लोबल टाइम नेटवर्क’ (GTN) का सीईओ है। एक हैकर-हत्यारा उसके न्यूज़ चैनल को हैक करके उस पर लाइव मर्डर प्रसारित कर देता है। एसीपी कबीर देशमुख (शरमन जोशी) को जिस बंदे पर शक होता है, उसका भी लाइव मर्डर हो जाता है। फिर ओबेरॉय की वकील (सारा ख़ान) और सरकारी वकील (गुरमीत चौधरी) के बीच भिड़ंत (इश्क़-मुहब्बत वाली) होती है।

फिलिम जैसी भी हो, लेकिन डायरेक्टर साब ने दो बातें बिल्कुल सच दिखायी हैं। फिलिम में लाइव मर्डर उसी तरह होता है, जिस तरह हमारे न्यूज़ चैनलों पर रोज़ लाइव डिबेट में न्यूज़ का मर्डर होता है।

दूसरी सच्चाई है- वकीलों का आपसी संबंध। जैसे सिया और रणबीर फिलिम में इश्क़ लड़ा रहे होते हैं, उसी तरह हमारे कपिल सिब्बल और अरुण जेटली भी परदे के पीछे मिल-जुल लेते हैं, कहने को बेशक दिन में एक-दूसरे के ख़िलाफ़ केस लड़ते रहते हैं।

सच्चाई बस यहीं तक है, क्योंकि असल ज़िंदगी में तो हमें राम जेठमलानी और कपिल सिब्बल जैसी मनहूस शक्लें ही मिली हैं अदालतों में।

अब बात एक्टिंग की! चलो उसे जाने ही दो। बस ये जान लो कि एसीपी बने शरमन जोशी ने इतने कपड़े बदले हैं कि बेचारे मोदी जी भी शरमा जायें। ऐसा लगता है कि बंदा ‘मान्यवर’ की एड में काम कर रहा है। पूरी फिलिम में तीन सीन में ही वर्दी में नज़र आया है और वो भी आधी रात को। दिन में तो मॉडल बनके ही घूमता रहता है। और सिया रूपी वकील साहिबा! लगता है मोहतरमा कोर्ट रूम में कम और ब्यूटी पार्लर में ज़्यादा रहती है। वैसे, मज़े की बात ये हैं कि सिया जी की परदे पे एंट्री गणेश जी की आरती करते हुए होती है। सच्ची-मुच्ची! और टेलेंट इतना है कि आधे कपड़ों में वॉयलिन भी बजा लेती हैं।

डायरेक्टर विशाल पांड्या साब ने फिलिम में इतने सस्पेंस डालने की कोशिश की है कि हॉस्पिटल वाले लास्ट सीन में भी ऐसा लगता है, जैसे अब नर्स भी हत्यारन निकलेगी। उन दर्शकों को भी थोड़ा निराश होना पड़ सकता है, जो इस फ़िल्म से कुछ ‘मोर’ की उम्मीद पाले हुए थे। क्योंकि पांड्या जी ने फ़िल्म में किस के लिये सिर्फ़ एक गाना फ़िक्स कर रखा था कि भाई जितनी चूमा-चाटी करनी है, इसी में कर ले, नहीं तो पहलाज अंकल कैंची चला देंगे।

जैसे ही फिलिम खतम हुई, मेरे बराबर में बैठे दोस्त आपस में झगड़ पड़े- इस गंद की ‘वजह’ तुम हो! तुम ही लेके आये थे कि चलो, ज़बरदस्त माल देखेंगे। ये दिखाने लाये थे साले! तो उनकी भावनाओं का ख़्याल रखते हुए हमारी तरफ़ से इस ‘वजह’ को मिलते हैं साढ़े चार बैंगन-Baingan 5



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