Thursday, 21st September, 2017

चलते चलते

फ़ेकिंग फ़िल्म रिव्यूः ये 'ट्यूबलाइट' तो फ़्यूज बल्ब निकली!

23, Jun 2017 By बगुला भगत

इत्ते टाइम से हल्ला मचा रक्खा था…ट्यूबलाइट आ रही है…सल्लू भाई की ट्यूबलाइट आ रही है और जब आयी तो पता चला कि ये तो ‘चाइनीज़ ट्यूबलाइट’ है…सिर्फ़ झमझम करती रहती है, पूरी जलती ही नहीं! और पिच्चर की टैगलाइन है- ‘क्या तुम्हें यक़ीन है…’ ख़ैर, किसी और का तो पता नहीं…पर सल्लू भाई को पूरा यक़ीन है…कि वो ईद पे हर बार पब्लिक का सूतिया कात सकते हैं।

tubelight
ये तो चाइनीज ट्यूबलाइट निकली रे!

ग़रीब आदमी अपने बाल-बच्चों के लिये किसी तरह चार पैसे बचाता है कि ईद पे उन्हें नये कपड़े दिलाऊँगा…जलेबी और समोसे खिलाऊँगा। लेकिन सल्लू भैय्या ईद पे अपनी गंद लेकर आ जाते हैं और उसकी जेब काट के ले जाते हैं।

स्टोरीः ती जी, पिच्चर की बैकग्राउंड में है- 1962 का भारत-चीन युद्ध! लक्ष्मण सिंह बिष्ट (सल्लू भैय्या) अपने छोटे भाई भरत (सोहेल भैय्या) के साथ कुमाऊँ के अपने गांव जगतपुर में रहता है। गांव के सब लोग उसको ट्यूबलाइट कहते हैं…क्योंकि वो चीज़ों को समझने में देर लगाता है, जैसे ट्यूबलाइट जलने में देर लगाती है। इस वजह से लक्ष्मण हर चीज़ के लिये भरत पे डिपेंड करता है।

अचानक हिंदुस्तान और चीन के बीच जंग शुरु हो जाती है और भरत जंग लड़ने चला जाता है और फिर लौटकर नहीं आता। लेकिन लक्ष्मण को यक़ीन है कि वो ज़रूर लौट के आयेगा। उसे यक़ीन इसलिये है क्योंकि बचपन में गाँधी जी ने उससे कहा था कि अगर तुम्हारे दिल में यक़ीन हो तो तुम चट्टान को भी हिला सकते हो। उसके बन्ने चाचा (ओमपुरी) भी उसे गाँधी जी के रास्ते पर चलने की सीख देते हैं।

पिच्चर में चाइनीज़ मूल की भारतीय ली लिन और उसका बेटा गुओ भी है, जिसे सल्लू भैय्या पूरी पिच्चर में ‘गू-गू’ कहते रहते हैं। पिच्चर देखने के बाद पब्लिक को भी यही लग रहा है कि ‘गू’ देख लिया…छी..छी! सच्ची में, ढाई घंटे की पिच्चर में घंटा समझ में नहीं आता… बैठे-बैठे पब्लिक भी ट्यूबलाइट हो जाती है।

और हाँ! पिच्चर में शाहरुख़ ख़ान का कैमियो भी है। क़सम खा के कह रहा हूँ कि अपनी पूरी लाइफ़ में मैंने इत्ता बुरा कैमियो नहीं देखा भाई!

एक्टिंगः पिच्चर में सबकी एक्टिंग ठीक-ठाक है सिर्फ़ सल्लू भैय्या को छोड़कर! सल्लू भैय्या को पिच्चर में बुद्धू लगना था, इसलिये डायरेक्टर कबीर ख़ान ने उन्हें रुलाने की बहुत ज़्यादा कोशिश की, लेकिन जब-जब वो रोते हैं…पब्लिक को हँसी आने लगती है। और हर टाइम उनकी ज़िप खुली रहती है। पिच्चर में ये पता नहीं चला कि उसे किसके लिये खोल के रखते हैं। वैसे, भाई सिर्फ़ ज़िप लगाना ही भूलते हैं, बाक़ी सारे काम एकदम टनाटन करते हैं। पिच्चर के हर सीन में एकदम चकाचक क्लीन शेव रहते हैं…सटासट! इत्ते चिकने तो वो भी नहीं रहते, जिनका किसी से चक्कर चल रहा होता है…जबकि भाई का तो पिच्चर में किसी से कोई चक्कर भी नहीं है।

एक बात और! पहाड़ी भाई दुबले-पतले होते हैं लेकिन हमारे 50 साल के सल्लू भाई…और सोहेल भाई…दोनों जलीकट्टू के ऐसे साँड जैसे लगते हैं…कि दोनों में से चार-चार पहाड़ी बंदे निकल आयेंगे।

म्यूजिकः ठीक-ठाक है। या कहें कि पिच्चर में यही चीज़ सबसे ठीक है, जो ट्यूबलाइट की तेज़ रोशनी से बचाती है।

और अब लास्ट में…लास्ट सीन भी सुन लो! नहीं सुनना पड़ेगा! तो भाई, भाई का भाई सोहेल भाई व्हील चेयर पे है…चीनियों के धमाकों से उसकी याद्दाश्त चली गयी है। लेकिन टेंशन की कोई बात नहीं! अपने सल्लू भाई डांस के दो-चार स्टेप्स दिखाते हैं…उसकी याद्दाश्त वापस लौट आती है। इसे कहते हैं- डांस थेरेपी! और इस थेरेपी के लिये हमारी ओर से सल्लू भैय्या को एक लालटेन- Lantern



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