Friday, 20th October, 2017

चलते चलते

फ़ेकिंग फ़िल्म रिव्यूः 'कुंग फू योगा' यानि स्टेनली (टॉन्ग) का डब्बा!

05, Feb 2017 By बगुला भगत

सच में डायरेक्टर स्टेनली (टॉन्ग) की ‘कुंग फू योगा’ डब्बा है डब्बा! ‘द मिथ’ नाम की गंद भी इन स्टेनली साब ने ही बनायी थी। सच कहूं तो ‘कुंग फू योगा’ 1962 के युद्ध के बाद चीन का भारत के साथ सबसे बड़ा धोख़ा है। आज 2017 में भी इंडिया में जादूगर, सांप-सपेरे, हाथी और राजकुमार-राजकुमारी। वाह स्टेनली बाबू वाह! अब तो ये सब हॉलीवुड वालों ने भी दिखाना छोड़ दिया।

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ये देखो…आर्कियोलॉजिस्ट और प्रोफ़ेसरों के ठुमके!

इस टाइटल का स्टेनली की पिच्चर के साथ कोई लेना-देना नहीं है। जैसे आप इंजीनियरिंग कॉलेज की मेस के मटर पनीर में ‘पनीर’ ढूंढते हो, वैसे ही कुंग फू योगा में ‘कुंग फू’ और ‘योगा’ ढूंढते रह जाओगे। थोड़ा बहुत ‘चाइल्डिश’ सा कुंग फू तो फिर भी मिल जायेगा।

वैसे, ये पिच्चर मोदी जी को और बाबा रामदेव को ज़रूर दिखानी चाहिये और दोनों को सिनेमा हॉल में सीट से बांध देना चाहिये ताकि कहीं भाग ना पायें। क्यों? क्योंकि ये डब्बा पिच्चर उन्हीं की देन है। ना वे इतना ‘योगा-योगा’ करते और ना हमें ये ‘योगा’ नाम की पिच्चर झेलनी पड़ती।

तो जी, कहानी (जो कि बहुत ‘लंबी-चौड़ी’ है!) कुछ यूँ है कि चाइनीज आर्कियोलॉजिस्ट जैक (जैकी चैन) भारत की प्रोफ़ेसर अश्मिता (दिशा पटानी) और कुछ चेले-चेलियों के साथ प्राचीन मगध साम्राज्य के ख़ज़ाने की खोज में निकलते हैं। तो पहले तिब्बत में बर्फ़ीली गुफ़ाओं में, फिर दुबई में और फिर फ़ाइनली भारत में पहुंच जाते हैं। साथ में अश्मिता की ख़ूबसूरत असिस्टेंट (अमायरा दस्तूर) और रैंडल (सोनू सूद) नाम का विलेन अपने गैंग के साथ मौजूद है, जो ख़ुद को उस ख़ज़ाने का वारिस बताता है।

सॉरी! जब वे सब ख़ज़ाने के लिये मार-धाड़ कर रहे थे तो थोड़ी देर के लिये मेरी आंख लग गयी। जब आंख खुली तो सारे हंसते-खेलते डांस कर रहे थे और पिच्चर खतम!

दर्शक लोग कह रहे थे कि ऐसा जैक जैसा आर्कियोलॉजिस्ट तो कहीं नहीं देखा यार! तो भैय्या चाइनीज माल है ना! इस तरह से ये जैकी की सबसे ‘डब्बा’ पिच्चर हो गयी आज तक की! और सोनू सूद? भाईसाब ने बैंड मास्टरों जैसे कपड़े पहने हैं पूरी पिच्चर में! पता नहीं, जया बच्चन ने क्या सोचकर कहा था कि सोनू सूद जवानी के अमिताभ जैसा दिखता है। जवानी का अमिताभ तो हमने भी देखा है जया ताई। सिर्फ़ लंबे होने से ही अगर लोग अमिताभ लगने लगते तो फिर रवि शास्त्री और खली किसी से कम हैं क्या?

बाक़ी बचीं पटानी और दस्तूर! तो उन्होंने वही किया है, जैसा हमारी पिच्चरों का दस्तूर है- एक से बढ़कर एक कपड़े पहनकर दिखाना और ठुमके लगाना!

तो हमारी तरफ़ से इस इंडो-चाइनीच पिच्चर को मिलते हैं साढ़े चार बैंगन। आप पूछोगे कि पूरे पांच क्यूं नहीं? तो वो इसलिये कि इस पिच्चर की वजह से जैकी चैन भारत तो आ गये। मेहरबानी साब मेहरबानी!Baingan-5