Saturday, 18th November, 2017

चलते चलते

फ़ेकिंग फ़िल्म रिव्यूः हरामख़ोर

12, Jan 2017 By बगुला भगत

सबसे पहली बात तो ये कि इस फिलिम का टाइटल ‘हरामख़ोर’ पहलाज निहलानी की नज़र और कैंची से कैसे बच गया, इसकी जांच होनी चाहिये। या तो उनकी कैंची कहीं खो गयी है या फिर उनकी कैंची उन्हीं पर चला दी गयी है।

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टीचर श्याम टेकचंद और स्टूडेंट संध्या

दूसरी बात, ‘हरामख़ोर’ स्कूलों में पढ़ने वाले किशोर बच्चों और उनके पैरेन्ट्स को ज़रूर देखनी चाहिये। लेकिन उससे भी ज़्यादा ज़रूरी ये इंजीनियरिंग स्टूडेंट्स के लिये है क्योंकि इस फिलिम में 10-12 साल के बच्चे ‘लव’ और ‘सेक्स’ के बारे में जितना जानते हैं, उतना तो हमारे इंजीनियरिंग स्टूडेंट्स 25 साल तक भी नहीं जान पाते। इतनी कच्ची उम्र में एक बच्चा अपने ‘ऑब्जैक्ट ऑफ़ अफ़ैक्शन’ को आईलवयू बोल देता है, उसके बाथरूम में झांकने की हिम्मत दिखा देता है और बोल देता है कि मैं तुमसे शादी करना चाहता हूं। सीखो…इंजीनियरिंग स्टूडेंट्स कुछ सीखो! फिलिम के हरामख़ोर टीचर से नहीं बल्कि इसके ‘स्मॉल’ स्टूडेंट कमल से!

फ़िल्म के राइटर-डायरेक्टर श्लोक शर्मा का दावा है कि ‘हरामख़ोर’ में समाज की सच्चाई दिखायी गयी है। लेकिन यह झूठ है। अगर फिलिम में सच्चाई होती तो उस क़स्बे की औरतों को एक शादीशुदा टीचर श्याम टेकचंद (नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी) और स्टूडेंट (श्वेता त्रिपाठी) के बीच चल रहे अफ़ेयर के बारे में कुछ भी पता नहीं चलता क्या! श्याम, संध्या के घर आता-जाता रहता है और पड़ोस की औरतें आपस में कुछ भी फुसफुसाहट नहीं करतीं । इससे पता चलता है कि फिलिम में पूरी सच्चाई नहीं दिखायी गयी है और फिलिम इंडिया में नहीं बनी है।

एक्टिंग की बात करें तो, नवाज़ुद्दीन को तो अच्छी एक्टिंग की आदत है ही, श्वेता त्रिपाठी ने भी अपनी पहली ही फिलिम (यह फ़िल्म ‘मसान’ से पहले बन गयी थी) में अच्छी एक्टिंग करके दिखा दी है। इतनी हड़बड़ी अच्छी नहीं है। कैटरीना कैफ़ को देखो! उसे एक्टिंग दिखाने की कोई जल्दबाज़ी नहीं है। और दोनों बाल कलाकार मास्टर इरफ़ान और मास्टर समद! दोनों बचपन में ही सल्लू भैय्या से अच्छी एक्टिंग करके उनसे पंगा ले रहे हैं। हम बताये देते हैं, ये उनकी सेहत के लिये अच्छा नहीं है।

और डायरेक्टर का नाम तो इतना संस्कारी है- श्लोक! और फिलिम बनाता है इतनी डार्क। आलोक नाथ से कुछ संस्कार सीखने चाहिये उसे, ताकि ‘हम आपके हैं कौन’ जैसी ब्लॉकबस्टर फ़िल्म बना सके। श्लोक भैय्या, सिर्फ़ डेढ़ घंटे की होने के बावजूद भी हरामख़ोर लंबी लगती है, तो समझ जाओ कि फिलिम कितनी धीमी है। अच्छा टॉपिक ही काफ़ी नहीं होता, उसमें अच्छी स्पीड भी रखनी पड़ती है और हॉर्न-वॉर्न भी बजाने पड़ते हैं। तो, मैथ्स के टीचर श्याम टेकचंद की इस फिलिम को हमारी ओर से बीजगणित में मिलते हैं-  5 में से 3 नंबर और 2 अंडे!



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